• [Hindi] क्या AI मानवोंकेलिए खतरा बनसकताहै?
    Jun 27 2026
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] Goldman-Sachs जैसी संस्थाओंके अनुमानकेअनुसार, AI वैश्विक स्तरपर लगभग 300 मिलियन पूर्णकालिक नौकरियोंको ऑटोमेट करसकताहै। उन्होंने उल्लेख कियाहैकि वर्तमानमें अमेरिका और यूरोपकी लगभग दो-तिहाई नौकरियाँ किसी-न-किसी स्तरपर AI ऑटोमेशनसे प्रभावित होसकतीहैं।इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) का दृष्टिकोण कुछ अधिक परंपरागत है। उसके अनुसार वैश्विक रोजगारका लगभग 2.3 प्रतिशत हिस्सा, अर्थात लगभग 75 मिलियन नौकरियाँ, पूर्ण ऑटोमेशनके जोखिममें हैं।साथही, श्रम शोधकर्ताओंने यह भी नोट कियाहैकि बड़े पैमानेपर अचानक होनेवाले ले-ऑफ्सकी संभावना कम है। इसके बजाय एंट्री-लेवल व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों तथा केवल शारीरिक श्रमपर आधारित "grunt work" करनेवाले कर्मचारियोंकी भर्ती धीमी पड़सकतीहै।फिरभी कुछ डूम्सडे भविष्यवक्ता अभीसे यह भविष्यवाणी करने लगेहैंकि AI अंततः मानवतापर कैसे हावी होजाएगा!क्या AI कभी मानवोंको पीछे छोड़सकताहै? निश्चितरूपसे, कुछ विशिष्ट भूमिकाओंमें हाँ।AI प्रणालियोंको ऐसे विशाल ज्ञानभंडारपर प्रशिक्षित कियाजाताहै, जिसे कोई भी एक अकेला मानव कभी पूरी तरह आत्मसात नहीं करसकता। उनमें विशाल मात्रामें डेटा इनजेस्ट करने, उसे प्रोसेस करने, और ऐसी गति से परिणाम देनेकी क्षमता होतीहै जिसकी कल्पना भी मनुष्य नहीं करसकता।लेकिन क्या इससे वे मानवोंके बराबर होजातीहैं, या उनसे श्रेष्ठ बनजातीहैं?मुझे ऐसा नहीं लगताहै। कमसेकम अपने वर्तमान स्वरूपमें तो बिल्कुल नहीं। आजके रूपमें वे अत्यधिक यांत्रिक हैं। वे उन कार्योंको संपन्न करतीहैं जो मानवोंको अत्यंत उबाऊ या थकाऊ लगतेहैं, और यह सब वे विशाल कंप्यूटिंग शक्तिका उपयोगकरतेहुए बिना किसी सचेत उद्देश्यके करतीहैं।आजका AI पैटर्न्सके आधारपर सही उत्तरका अनुमान लगानेमें बहुत अच्छा काम करसकताहै। लेकिन जैसा मैंने पिछले एपिसोड्समें चर्चा कीथी, वह वास्तवमें यह "समझ" नहीं सकताकि वह किस चीजका निष्कर्ष निकालरहाहै। न ही उसके पास अपने किसी भी कार्यको करनेकी कोई वास्तविक "मोटिवेशन" होतीहै। उसका मानवोंसे आगे निकलनेका कोई उद्देश्य नहीं है। और वर्तमानमें वह उसकेलिए तैयार भी नहीं है।उसका ज्ञान चाहे जितना विशाल क्योंनहो, वह केवल उन जानकारियोंतक सीमित है जो ...
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  • [Hindi] क्या ए-आई प्रणालियों में वास्तव में चेतना है?
    Jun 20 2026
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] ब्लेक लेमोइन नामक गूगल के एक पूर्व कर्मचारी के लिए यही प्रश्न उनकी नौकरी और प्रतिष्ठा खोने का कारण बना। संभवतः आपने इसके बारे में पढ़ा होगा।2022 में, जब वे गूगल की एआई प्रणालियों में से एक 'लैम्डा' का परीक्षण कर रहे थे, तब ब्लेक को लगा कि उस एआई में चेतना है! वे यहीं नहीं रुके। इसके बजाय, उन्होंने उस एआई के अधिकारों के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप उन्हें अपनी नौकरी गंवानी पड़ी।AI सिस्टम की चेतना के बारे में बात करने से पहले, आइए सबसे पहले अपने खुद के चेतन अनुभव को समझें। हम चेतन अनुभव कैसे प्राप्त करते हैं, यह प्रश्न लंबे समय से तंत्रिका-विज्ञानियों के लिए एक पहेली बना हुआ था। जब फंक्शनल एम-आर-आई स्कैनर जैसे आधुनिक उपकरणों का आविष्कार हुआ, तब तंत्रिका-विज्ञानी मानव-मस्तिष्क की विभिन्न ग्रहण प्रक्रियाओं को समझाने में सक्षम हुए। वे मस्तिष्क के उन सटीक क्षेत्रों की पहचान करसके जो किसी विशेष प्रकार की अनुभूति के लिए उत्तरदायी होते हैं।लेकिन प्रारंभ में यह स्पष्ट नहीं था कि मस्तिष्क के विभिन्न भागों में फैले हुए जटिल अनुभव किस प्रकार एकीकृत होकर साकार होते हैं।उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि आप एक वृक्ष को देखते हैं। आप तुरंत पहचान लेते हैं कि वह किसी विशेष प्रजाति का वृक्ष है। तंत्रिका-विज्ञानी मस्तिष्क के उन विशिष्ट क्षेत्रों को इंगित करसकते थे जो वृक्ष की पत्तियों, उसके फलों, उसके तने आदि की पहचान करते हैं।लेकिन आपका वास्तविक अनुभव मस्तिष्क के अनेक क्षेत्रों द्वारा संसाधित होता है। फिर भी मस्तिष्क में ऐसा कोई एक विशिष्ट क्षेत्र नहीं है जो वृक्ष की संपूर्ण छवि को एकत्रित करके आपको यह अनुभव कराए कि, 'अहा! यह आम का पेड़ है!'तंत्रिका-विज्ञानियों ने इस समस्या को 'बाइंडिंग प्रॉब्लम' कहा। अर्थात्, मस्तिष्क के विभिन्न भागों में बिखरी हुई सूचनाओं को एकीकृत करके उन्हें परस्पर जोड़ने की समस्या।1900 के दशक के उत्तरार्ध में, अमेरिकी तंत्रिका-विज्ञानी बर्नार्ड बार्स ने इस घटना की व्याख्या करने के लिए 'ग्लोबल वर्कस्पेस थ्योरी' नामक सिद्धांत प्रस्तुत किया। वह सिद्धांत काफी हद तक रूपकात्मक था।बार्स के रूपक की काफी आलोचना हुई। क्योंकि उससे ऐसा प्रतीत होता था मानो अनुभव करने ...
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  • [Hindi] क्या आजकी AI प्रणालियाँ सचमुच कुछ समझतीहैं?
    Jun 13 2026
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] जिस किसीने भी ChatGPT, Gemini, या ऐसी किसी अन्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ काम कियाहै, उसे शायद ऐसा लगाहोगा कि वे वास्तवमें समझतीहैं। एक AI हमारे साथ लगभग एक सामान्य इंसानकी तरह संवाद करतीहै। वह मज़ाक करतीहै, और हमारे व्यंग्यपूर्ण कथनों तथा छोटी-मोटी आपत्तियोंपर भी इंसानोंकी तरह प्रतिक्रिया देतीहै।यदि आप उससे अपने व्याख्यानके लिए प्रस्तुति स्लाइड तैयार करनेके लिए कहें, तो वह शायद आपसे भी बेहतर काम करदे। मैंने तो यहभी सुनाहै कि बहुतसे विद्यार्थी अपने स्कूल और कॉलेजके assignment भी AI से ही करवाने लगेहैं।तो फिर, क्या यह स्पष्ट नहींहै कि वे चीज़ोंको समझतीहैं? बिल्कुल नहीं। इसका कारण यहहै कि आजकी AI प्रणालियाँ जिस प्रकार बनाई गईहैं, वही ऐसा है। वास्तवमें उनमें किसी भी चीज़को समझनेकी क्षमता ही नहीं होती।एक AI मूल रूपसे यही करतीहै—आपने जो कहाहै, या उसे पहले जो सिखायागयाहै, उसके आधारपर वह केवल pattern matching करतीहै और यह अनुमान लगातीहै कि आपके प्रश्नका सबसे उपयुक्त उत्तर क्या होसकताहै।वैसे यह उतनी बुरी बात भी नहींहै। आखिर हममेंसे बहुतसे लोग भी यही करतेहैं। अधिकांश लोग pattern matching और अनुमान लगानेवाली मशीनोंकी तरह ही काम करतेहैं। हम किसी बातको गहराईसे समझनेका प्रयास बहुत कम करतेहैं।तो फिर, वास्तविक समझमें क्या-क्या शामिल होताहै?बहुत सरल शब्दोंमें कहें, तो इसका अर्थ है किसी नए शब्दको किसी ऐसी चीज़से जोड़ना जिसे हम पहलेसे जानतेहैं। या दूसरे शब्दोंमें, किसी नए शब्दका अर्थ उस चीज़की सहायतासे समझना जो हमें पहलेसे परिचित है।लेकिन यह जुड़ाव केवल शब्दोंतक सीमित नहीं होता। यह उससे कहीं आगे जासकताहै।उदाहरणके लिए, जैसे ही कोई "बिल्ली" शब्द कहताहै, हमारा मन उस शब्दको एक मुलायम, रोएँदार जीवसे जोड़ देताहै, जिसके चार पैर होतेहैं, एक लंबी पूँछ होतीहै, और जो कभी-कभी गुनगुनाने जैसी आवाज़ निकालतीहै। वास्तवमें हम किसी शब्दको उस जीवके पूरे विवरणसे जोड़तेहैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करताहै।हमारी समझ केवल दृश्य अनुभवतक भी सीमित नहीं होती।यदि आप कभी दक्षिण-पूर्व एशियाके कुछ देशोंमें गएहों, तो केवल "ड्यूरियन" शब्द सुनतेही अनेक बातें आपके मनमें आसकतीहैं—उसकी तीखी गंध, जो लगभग मतली पैदा करसकतीहै, और फिरभी उसका ...
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  • [Hindi] हमारी भावनाओं और अनुभूतियोंका कारण क्या है?
    Jun 6 2026
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] भावनाएँ और अनुभूतियाँ केवल जीवित प्राणियोंमें पाईजानेवाली विशिष्ट विशेषताएँ मानीजातीहैं। निर्जीव वस्तुओंमें वे नहीं होतीं। वास्तवमें, उन्हें अक्सर जीवनके प्रमुख लक्षणोंमेंसे एक मानाजाताहै। तो फिर उनका कारण क्या है?यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदनके तंत्रिका-विज्ञानियोंकी एक टीमने इस विषयपर कुछ अध्ययन किए। जब हमारेभीतर भावनाएँ और अनुभूतियाँ उत्पन्न होतीहैं, तब हमारे मस्तिष्कमें होनेवाले परिवर्तनोंका अध्ययनकरनेकेलिए उन्होंने फंक्शनल एमआरआई (f-MRI) स्कैनर जैसे अत्याधुनिक उपकरणोंका उपयोग किया। उन्होंने कुछ सरल प्रयोग किए। कुछ महिला स्वयंसेवकोंको बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं। इनमेंसे कुछ तस्वीरें उनके अपने बच्चोंकी थीं, जबकि कुछ ऐसे बच्चोंकी थीं जिन्हें वे जानती थीं, लेकिन जिनसे उनका कोई रक्त-संबंध नहीं था।f-MRI स्कैनरोंकी सहायता से उन्होंने उन महिलाओंके मस्तिष्कका अवलोकन किया। उन्होंने दो बातें पहचानीं। जब ये प्रतिभागी अपने बच्चोंकी तस्वीरें देख रही थीं, तब उनके मस्तिष्कके कुछ भाग सक्रिय होरहेथे, जबकि कुछ अन्य भाग निष्क्रिय होरहेथे, अर्थात दबाए जारहेथे।यह सक्रियता बच्चोंके प्रति माँके प्रेमकी भावना को व्यक्त कररहीथी, जबकि निष्क्रियता उन बच्चोंकी कमियोंके प्रति एक प्रकारकी उदासीनताको दर्शारहीथी। दूसरे शब्दोंमें, वे अपने बच्चोंको उनकी त्रुटियों और कमियोंके बावजूद प्रेम करती थीं।लेकिन जब उन्हें ऐसे बच्चोंकी तस्वीरें दिखाई गईं जिन्हें वे जानती तो थीं, पर जो उनके अपने बच्चे नहीं थे, तब वहाँका दृश्य अलग था।वैज्ञानिकोंने अनुमान लगाया कि माताओंके इस विशेष व्यवहारका कारण मस्तिष्कमें स्रावित होनेवाले कुछ न्यूरो-हार्मोन (neuro-hormones) तथा मस्तिष्कके रिवॉर्ड सेंटरमें उपस्थित कुछ विशिष्ट रिसेप्टरोंकी उनकी प्रति प्रतिक्रिया होसकतीहै।उन्होंने प्रयोगशालाके पशुओंको ऐसे रसायन दिए जो इन हार्मोनोंके प्रभावको समाप्त करदेतेथे। ऐसा करनेपर माँ चूहियाँ अपनी संतानोंके प्रति स्वाभाविक वात्सल्य और पालन-पोषणकी भावनासे पूरीतरह मुक्त होगईं। इससे स्पष्ट था कि वे हार्मोन उन भावनाओंकेलिए उत्तरदायी थे।इन्हीं वैज्ञानिकोंने प्रेमियोंके बीच उत्पन्न होनेवाली ...
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  • [Hindi] क्या हमारे पास स्वतंत्र इच्छा है?
    May 30 2026
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] दशकों पहले, Benjamin Libet नामक एक अमेरिकी न्यूरोसाइंटिस्ट ने इसे निश्चित-करनेका प्रयास किया। उनके-द्वारा किए-गए प्रयोगोंने उस-समय बहुत बड़ा सनसनीखेज प्रभाव पैदा किया था, और आजभी न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच इस विषयपर चर्चाएँ चलती-रहतीहैं।आख़िर लिबेटने किया क्या था? लिबेटने एक अत्यंत सरल प्रयोग किया। उस प्रयोगमें भाग-लेनेवालोंसे कहा गया कि वे अपनी इच्छासे एक बटन दबाएँ। एक सटीक घड़ीका उपयोग-करके उन्हें यह दर्ज-करनेकेलिए कहा गया कि उन्होंने बटन दबानेका निर्णय किस क्षण लिया। साथही, उन्होंने वास्तवमें बटन कब दबाया, यह समयभी दर्ज किया गया।लिबेटने एक और काम किया। उन्होंने प्रतिभागियोंके सिरपर प्रोब्स लगाए और उनके मस्तिष्कके भीतर होनेवाले कुछ विशेष विद्युत संकेतोंको मापा। ये संकेत इस-बातको दर्शातेथे कि मस्तिष्क किसी शारीरिक क्रियाकेलिए तैयारी कररहाथा।स्वाभाविक रूपसे, बटन दबानेका निर्णय लेने और वास्तवमें उसे दबानेकेबीच थोड़ा समयांतर तो होना ही चाहिए। इसमें कुछभी अजीब नहींहै। मनके निर्णयको क्रियामें बदलनेकेलिए शरीरको थोड़ा समय लगताहीहै।आश्चर्यकी बात यहथी कि प्रतिभागियोंके सचेत रूपसे बटन दबानेका निर्णय लेनेसे पहलेही उनका मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी शुरू-करचुकाथा। प्रोब्सके माध्यमसे मापीगई विद्युत गतिविधियोंने यही दिखाया!इससे कई प्रश्न उत्पन्न हुए। प्रतिभागियोंके निर्णय लेनेसे पहलेही मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी कैसे करसकताथा? या फिर क्या वही मस्तिष्कीय गतिविधि प्रतिभागियोंको निर्णय लेनेकेलिए प्रेरित कररहीथी? यदि ऐसा था, तो इसका अर्थ यह हुआ कि प्रतिभागियोंने वह कार्य वास्तवमें अपनी स्वतंत्र इच्छासे नहीं किया था, जैसा वे समझरहेथे।इस प्रयोगने अनेक बहसों और नई सिद्धांतोंको जन्म दिया। अनेक वैज्ञानिकोंने इसे इस-बातका प्रमाण माना कि स्वतंत्र इच्छा जैसी कोई चीज़ होतीहीनहीं, और हर चीज़ पूरीतरह कारण-चालित होतीहै।हालाँकि स्वयं लिबेटने यह पुष्टि कीथी कि प्रतिभागी अंतिम क्षणमें अपने पहलेके निर्णयको बदलनेमें सक्षमथे, फिरभी ये बहसें नहीं रुकीं।स्वतंत्र इच्छा न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच सबसे अधिक चर्चा किए-जानेवाले विषयोंमेंसे एकहै। उन्हें लगताहै कि...
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  • [Hindi] आपका जन्म ही आपकी किस्मत नहीं बनजाना चाहिए, हैना?
    May 23 2026
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] आइए, एक सरल उदाहरण से अपनी चर्चा शुरू करें।कल्पना कीजिए एक 100 मीटर की दौड़ की। एक न्यायपूर्ण दुनिया में, हर व्यक्ति शून्य मीटर की रेखा पर खड़ा होता है। स्टार्टिंग पिस्टल चलती है, सीटी बजती है, और जो सबसे तेज़ दौड़ता है वही जीतता है। सरल है, हैना?लेकिन दुर्भाग्य से हम ऐसी दुनिया में नहीं रहते। असल दुनिया में — चाहे आप न्यूयॉर्क, लंदन, टोक्यो या नई दिल्ली में हों — यह दौड़ इतनी न्यायपूर्ण नहीं होती। दौड़ शुरू होनेसे पहले ही कुछ लोग 50 मीटर के निशान पर खड़े होते हैं, जबकि कुछ लोगोंको शुरुआती रेखा से 20 मीटर पीछे से शुरुआत करनी पड़ती है।आप शायद समझ ही गए होंगे कि मैं किस दौड़ की बात कररहा हूँ। यह है सामाजिक असमानता की दौड़।दशकों से दुनिया भर के समाज इसे सुधारने की कोशिश कररहे हैं। अमेरिका जैसे देशों में "अफर्मेटिव एक्शन", यूरोप में "सामाजिक विविधता कोटा", और एशिया में "आरक्षण व्यवस्था" के माध्यम से इस असमानता को मिटाने के प्रयास लगातार होतेरहे हैं।ये सभी अच्छे इरादों वाले प्रयास थे। लेकिन हमें ईमानदारी से एक बात स्वीकार करनी होगी: वर्तमान व्यवस्थाएँ पूरी तरह असफल होचुकी हैं।असमानता को समाप्त करने के बजाय, ये राजनीतिक युद्धभूमियाँ बनचुकी हैं। ये ऐसे राजनीतिक फुटबॉल खेल बनगए हैं, जिनका उपयोग नेता चुनाव जीतने और अपने वोट-बैंक सुरक्षित करने केलिए करते हैं। लेकिन असली समस्या वहीं की वहीं बनी हुई है, बल्कि दिन-प्रतिदिन और बढ़ती जारही है।जिस पुरानी व्यवस्था का हम अभी उपयोग कररहे हैं, उसमें दो बड़ी खामियाँ हैं जिन्हें हर कोई देख सकता है, लेकिन जिनके बारे में खुलकर बात करना कोई पसंद नहीं करता।• पहली बात, यह व्यवस्था बहुत अधिक सरलीकृत और केवल दिखावटी है। यह मानकर चलती है कि यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष सामाजिक वर्ग या जाति से है, तो वह निश्चित रूपसे वंचित होगा। लेकिन हम सब जानते हैं कि लंदन के आलीशान निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अमीर "निम्नवर्गीय परिवार" भी हैं, और ऐसे गरीब "उच्चवर्गीय परिवार" भी हैं जिनके बच्चे सचमुच भूख से पीड़ित हैं। जब कोई अमीर बच्चा गरीबों केलिए आरक्षित सुविधा का लाभ लेता है, तो वह उसी समुदाय के किसी वास्तव में ज़रूरतमंद बच्चे से अवसर "छीनने" जैसा होता है।• दूसरी बात, हमारे ...
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  • [Hindi] अन-ध्यान मत कीजिए: आपका मोबाइल आपके मन को भटका सकता है.
    May 16 2026
    [Preview books] [Borrow books] [Pause] संभव है कि आपने जीवन में कभी न कभी ध्यान करनेकी कोशिश की हो। अधिकांश लोग तनाव कम करनेकेलिए ध्यान करते हैं। वे इसे मनको शांत करनेका एक तरीका मानते हैं, या अपने स्वास्थ्यको सुधारनेके मार्गके रूपमें उपयोग करते हैं।लेकिन आज मैं "अन-ध्यान" के बारेमें बात करनेवाला हूँ। आप सोच रहे होंगे कि इसका अर्थ क्या है। भले ही आप इसे तुरंत पहचान न पाएँ, मुझे पूरा विश्वास है कि आप इसे अपनी कल्पनासे कहीं अधिक कर रहे हैं। और मैं यही समझानेवाला हूँ। आइए हम एक सामान्य समस्या से शुरुआत करें, जिसका सामना हम सभी करते हैं — तनाव।अलग-अलग लोगोंके तनावमें आनेके कारण अलग हो सकते हैं। लेकिन अधिकांश परिस्थितियोंमें इसके पीछे काम करनेवाली जैविक प्रक्रिया लगभग समान होती है। आगे बढ़नेसे पहले, आइए तनावके पीछे काम करनेवाले इस मूल तंत्रको थोड़ा समझ लें।तनाव केवल मनुष्योंमें ही नहीं होता। पशु भी इसका अनुभव करते हैं।जब कोई पशु अपनी ओर तेजीसे आते हुए किसी शिकारीको देखता है, तब उसकी आँखें चित्रोंकी एक श्रृंखला मस्तिष्कको भेजती हैं। ये चित्र यह जानकारी देते हैं कि खतरा कितना निकट है, कितनी तेजीसे आ रहा है, और किस दिशासे आ रहा है।आँखें इन चित्रोंको एकके बाद एक मस्तिष्कतक पहुँचाती हैं, बिल्कुल पुराने चलचित्रकी फ्रेमोंकी तरह। मस्तिष्कको इनका तेजीसे विश्लेषण करना पड़ता है और खतरेकी मात्रा का अनुमान लगाना पड़ता है।इनमेंसे प्रत्येक चित्र मस्तिष्कमें तंत्रिकाकोशिकाओंकी गतिविधिके रूपमें संकेतित होता है। और ऐसे चित्रोंकी एक निरंतर श्रृंखला आती रहती है। जैसे-जैसे शिकारी निकट आता है, ये चित्र बदलते रहते हैं। स्वाभाविक रूपसे परिस्थितिके अनुसार मस्तिष्ककी प्रतिक्रिया भी बदलती रहती है।पशुको या तो लड़ना पड़ता है या वहाँसे भागना पड़ता है। इसे "फाइट ऑर फ्लाइट" प्रतिक्रिया कहा जाता है। इन दोनोंमेंसे कुछ भी करनेकेलिए शरीरके हाथ-पैरोंमें अधिक शक्तिकी आवश्यकता होती है। इस आवश्यकताकी पूर्ति उन भागोंमें अधिक रक्तप्रवाहके द्वारा की जाती है।मांसपेशियोंतक अधिक रक्त पहुँचानेकेलिए हृदयकी धड़कन बढ़ जाती है। उसीके अनुसार श्वासकी गति भी बढ़ती है। यह सब एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल जैसे हार्मोनोंके स्वचालित स्रावके ...
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  • [Hindi] वो प्रश्न जो हर उत्तर से परे रहा: सृष्टि के मिथक से आत्म-साक्षात्कार तक।
    May 9 2026
    [Quick links] [Borrow books] [Pause] शायद इस धरती पर अपने आप से यह पूछने वाला कि वह यहाँ कैसे आया है, केवल मनुष्य ही है। बाकी सभी जीव तो इस बात में ही व्यस्त हैं कि इस जगत में कैसे जियाजाए!अधिकांश धर्मों में ऐसी सृष्टि कथाएँ मिलती हैं जो बताती हैं कि किसी एक सर्वशक्तिमान ईश्वर ने इस जगत को रचा है। इन कथाओं के कई रूप हैं। मनुष्य सृष्टिकर्ता को अपने जैसा ही कल्पित करता है — अधिकार, करुणा, उदारता और पितृत्व के भाव के साथ। क़ुरान के 49वें अध्याय के 13वें श्लोक में अल्लाह कहता है:- "हे मानवजाति! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया है, और तुम्हें विभिन्न जातियों और क़बीलों में इसलिए बाँटा है ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो — न कि एक दूसरे से घृणा करने के लिए।"-इसी तरह की कहानी बाइबल में भी मिलती है। वहाँ ईश्वर आदम और हव्वा को रचता है, और कहा जाता है कि पूरी मानवजाति इसी मूल युगल से आई है। हिंदू धर्म में भी जगत के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की कथा है।इन सभी कथाओं के अनुसार, सृष्टिकर्ता और सृष्टि अलग हैं। सृष्टिकर्ता मूल स्रोत है और यह सृष्टि उसी से उत्पन्न हुई है।लेकिन इन कथाओं में एक रोचक बात यह है कि ये मनुष्य को ही ईश्वर का सीधा वंशज दिखाती हैं। बाकी सभी जीव मानो जैसे मनुष्य की सेवा के लिए ही हों!पर यह सरल दृष्टिकोण, जो सृष्टि को एक मानवीय क्रिया मानता है, भारत के प्राचीन सांख्य दर्शन को संतुष्ट नहीं कर सका। उन्होंने विकास का अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया।उनके अनुसार, इस जगत का कोई सृष्टिकर्ता नहीं है। बल्कि, यह जगत एक निरंतर विकास प्रक्रिया का परिणाम है।उन्होंने कहा कि शुरुआत में 'प्रधान' नामक एक आदिम स्थिति थी। वास्तव में यह 'प्रधान' कोई वस्तु नहीं, बल्कि सत्त्व, रजस और तमस इन तीन गुणों की संतुलित अवस्था है। यह 'प्रधान' स्वयं पुनरुत्पत्ति और पुनर्संयोजन के माध्यम से विकसित होकर सम्पूर्ण भौतिक जगत बन गया। सांख्य ने इसे 'प्रकृति' कहा।लेकिन फिर एक मूल प्रश्न उठा। इतनी विविध और आनंद देने वाली प्रकृति का क्या लाभ, जब उसे अनुभव करने वाला कोई न हो? इसलिए उन्होंने 'पुरुष' नामक चेतन तत्त्व की कल्पना की, जो प्रकृति के साथ स्थित है और उसे अनुभव कर सकता है। पुरुष चेतन है, इसलिए वह इस जगत का अनुभव कर सकता है।इस प्रकार सांख्य दर्शन में ...
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