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[Hindi] क्या हमारे पास स्वतंत्र इच्छा है?

[Hindi] क्या हमारे पास स्वतंत्र इच्छा है?

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[Preview books] [Borrow books] [Pause] दशकों पहले, Benjamin Libet नामक एक अमेरिकी न्यूरोसाइंटिस्ट ने इसे निश्चित-करनेका प्रयास किया। उनके-द्वारा किए-गए प्रयोगोंने उस-समय बहुत बड़ा सनसनीखेज प्रभाव पैदा किया था, और आजभी न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच इस विषयपर चर्चाएँ चलती-रहतीहैं।आख़िर लिबेटने किया क्या था? लिबेटने एक अत्यंत सरल प्रयोग किया। उस प्रयोगमें भाग-लेनेवालोंसे कहा गया कि वे अपनी इच्छासे एक बटन दबाएँ। एक सटीक घड़ीका उपयोग-करके उन्हें यह दर्ज-करनेकेलिए कहा गया कि उन्होंने बटन दबानेका निर्णय किस क्षण लिया। साथही, उन्होंने वास्तवमें बटन कब दबाया, यह समयभी दर्ज किया गया।लिबेटने एक और काम किया। उन्होंने प्रतिभागियोंके सिरपर प्रोब्स लगाए और उनके मस्तिष्कके भीतर होनेवाले कुछ विशेष विद्युत संकेतोंको मापा। ये संकेत इस-बातको दर्शातेथे कि मस्तिष्क किसी शारीरिक क्रियाकेलिए तैयारी कररहाथा।स्वाभाविक रूपसे, बटन दबानेका निर्णय लेने और वास्तवमें उसे दबानेकेबीच थोड़ा समयांतर तो होना ही चाहिए। इसमें कुछभी अजीब नहींहै। मनके निर्णयको क्रियामें बदलनेकेलिए शरीरको थोड़ा समय लगताहीहै।आश्चर्यकी बात यहथी कि प्रतिभागियोंके सचेत रूपसे बटन दबानेका निर्णय लेनेसे पहलेही उनका मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी शुरू-करचुकाथा। प्रोब्सके माध्यमसे मापीगई विद्युत गतिविधियोंने यही दिखाया!इससे कई प्रश्न उत्पन्न हुए। प्रतिभागियोंके निर्णय लेनेसे पहलेही मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी कैसे करसकताथा? या फिर क्या वही मस्तिष्कीय गतिविधि प्रतिभागियोंको निर्णय लेनेकेलिए प्रेरित कररहीथी? यदि ऐसा था, तो इसका अर्थ यह हुआ कि प्रतिभागियोंने वह कार्य वास्तवमें अपनी स्वतंत्र इच्छासे नहीं किया था, जैसा वे समझरहेथे।इस प्रयोगने अनेक बहसों और नई सिद्धांतोंको जन्म दिया। अनेक वैज्ञानिकोंने इसे इस-बातका प्रमाण माना कि स्वतंत्र इच्छा जैसी कोई चीज़ होतीहीनहीं, और हर चीज़ पूरीतरह कारण-चालित होतीहै।हालाँकि स्वयं लिबेटने यह पुष्टि कीथी कि प्रतिभागी अंतिम क्षणमें अपने पहलेके निर्णयको बदलनेमें सक्षमथे, फिरभी ये बहसें नहीं रुकीं।स्वतंत्र इच्छा न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच सबसे अधिक चर्चा किए-जानेवाले विषयोंमेंसे एकहै। उन्हें लगताहै कि...
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