BHARAT LAUTA SHRI RAM NISHANI LEKAR
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अयोध्या लौटने की विनती अस्वीकार किए जाने पर भरत मौन रह जाते हैं। रात को कैकेयी स्वयं राम की कुटिया में जाकर उनसे अनुरोध करती हैं कि यदि वह उन्हें माँ मानते हैं, तो उनकी आज्ञा का पालन करें और अयोध्या लौट चलें। परंतु राम तर्क देते हैं कि यदि वह उन्हें एक अपमानजनक जीवन देना चाहती हैं, तो वे लौटने को तैयार हैं। राम के उत्तर से कैकेयी निरुत्तर हो जाती हैं। अगले दिन सभा बुलाई जाती है। गुरु वशिष्ठ जनक से कहते हैं कि इस धर्मसंकट की घड़ी में केवल वे ही मार्गदर्शक बन सकते हैं। राम और भरत जनक के निर्णय का पालन करने का वचन देते हैं। भरत विनम्रता से राम का वन में ही राज्याभिषेक करने की विनती करते हैं। जनक भगवान शंकर का स्मरण कर निर्णय देते हैं कि प्रेम धर्म से परे होता है, और भरत का निष्कलंक प्रेम अधिक शक्तिशाली है। लेकिन प्रेम निःस्वार्थ होता है, वह कुछ माँगता नहीं, केवल देता है। वह भरत से कहते हैं कि वह राम से उनकी इच्छा पूछें और उसी का पालन करें। भरत राम से विनती करते हैं। राम भरत के प्रेम से प्रभावित होकर राज्य स्वीकार करते हैं, पर वनवास की अवधि पूर्ण होने तक राज्य संचालन का दायित्व भरत को सौंपते हैं। भरत राम से चरण पादुकाएं लेकर, उन्हें सिर पर धारण कर अयोध्या लौटते हैं और उन्हें सिंहासन पर रख राम के प्रतिनिधि रूप में शासन की घोषणा करते हैं और स्वयं नंदीग्राम में कुटिया बनाकर तपस्वी जीवन बिताते हुए राज्य का संचालन करने लगते हैं। पत्नी मांडवी भरत की सेवा करने की इच्छा से कुटिया आती हैं, पर भरत उन्हें माता कौशल्या की सेवा करने के लिए महल में वापस भेज देते हैं। इधर राम यह जानकर कि अयोध्यावासी चित्रकूट तक पहुँच चुके हैं, दंडकारण्य की ओर प्रस्थान करते हैं। कैकेयी, पश्चाताप की अग्नि में तपकर, भरत से मिलने नंदीग्राम आती हैं और कुटिया में रहने का आग्रह करती है, लेकिन भरत कैकेयी को कर्मों का फल स्वरुप पाई हुई पीड़ा को राजमहल में भोगने के लिए कहते है, क्योंकि उसके हृदय में अब भी कैकेयी के द्वारा किए गए प्रकरण की ज्वाला प्रज्वलित थी।